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21वीं सदी की असुरक्षित महिलाएं सबसे बड़ी चिंता

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सांकेतिक चित्र
भारत में महिलाओं की स्थिति सदैव एक समान नहीं रही है. इसमें परिर्वतन होता रहा है. 19वीं सदी के मध्यकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक आते-आते पुन: महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ और महिलाओं ने शैक्षिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, प्रशासनिक, खेलकूद आदि विविध क्षेत्रों में उपलब्धियों के नये आयाम तय किए.
अफसोस की बात है, कि आज आजादी के 71 वर्ष बाद भी हमारे देश को पुरुष प्रधान देश कहा जाता है. बावजूद इसके आज महिलाएं आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी हैं, जिसने पुरुष प्रधान चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता प्रदर्शित की है.
आज की नारी राजनीति से लेकर कला जैसे हर क्षेत्र में नये आयाम गढ़ रही है. आंकडें बताते हैं, कि हर साल कुल परीक्षार्थियों में 50 प्रतिशत महिलाएं मेडिकल एग्जाम पास करती हैं. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है, कि एक महिला हर उस मुकाम को हासिल करने में सक्षम है, जिसकी उसे चाह हो, बस जरुरत होती है अपनों के प्यार और साथ की.
हालांकि महिलाओं के लिए दुनिया तब भी कठिन थी और आज भी कठिन ही है. ऐसा इसलिए क्योंकि आजादी से पहले महिलाएं कुछ ऐतिहासिक कुप्रथाओं का शिकार होती रहीं, जिनमें सती, जौहर, परदा, देवदासी जैसी कुप्रथा शामिल हैं. इन परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म जैसे क्षेत्रों में सफलता हासिल की. भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. इंदिरा जी, हर उस महिला के लिए मिसाल हैं जो घर की चारदीवारी में कैद न रहकर अपने सपनों को जीने की चाह रखती है. यह भी पढ़ें : ‘अप्रोच्स टू द टीचर्स’ कार्यक्रम में शिक्षण और वैश्विक शांति पर आचार्य हरिप्रसाद ने साझा किए अपने विचार 
आज की स्त्री पुराने समय में जीने वाली महिला के मुकाबले कहीं ज्यादा निडर और आत्मविश्वासी है. उसमें खुद के खिलाफ होने वाले किसी प्रकार के दुराचार के विरुद्ध आवाज उठाने की क्षमता है. प्राचीन समय की स्त्रियों के बारे में हम यह पूर्णत: नहीं कह सकते कि उनमें आत्मविश्वास और निर्भीक बनकर जीवन जीने की कमी थी. क्योंकि ऐसा कहना गलत होगा. इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं भारत की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई. लेकिन अगर सामान्य परिवार की महिलाओं की स्थिति के बारे में बात करें तो उस समय बहुत कम महिलाएं ऐसी थीं, जो बिना डरे अपने विचारों को किसी के भी सामने प्रस्तुत कर सकी थीं. और इसकी वजह केवल नारी ही नहीं, बल्कि उस समय का समाज और उनके आस-पास का परिवेश था, जो हमेशा स्त्री की आवाज को दबाने का प्रयास करता रहा.
लेकिन आज के समय में भी अगर कोई महिला अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करती तो उसकी सबसे बड़ी वजह है लोगों की सोच. एक पुरुष और समाज के हर एक शख्स को हर महिला का सम्मान करना चाहिए और उनकी सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए. विवेकानंद ने कहा था कि जब तक स्त्रियों की दशा नहीं सुधारी जाएगी, तब तक संसार में समृद्धि की कोई संभावना नहीं होगी. पक्षी एक पंख से कभी नहीं उड़ पाता. आज भले ही देश में महिलाएं आत्मनिर्भर हों लेकिन सुरक्षित नहीं हैं और यह चिंता का विषय है.
– प्रिया सिंह

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