Home Articles अंतस की जागृति का संदेश देता है दीपावली का पर्व…

अंतस की जागृति का संदेश देता है दीपावली का पर्व…

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दीपावली का त्यौहार भारतीय संस्कृति का गौरव है, क्योंकि दीपावली रोशनी का पर्व है. दीया प्रकाश का प्रतीक है और तमस को दूर करता है. यही दीया हमारे जीवन में रोशनी के अलावा हमारे लिये जीवन की सीख भी है. जीवन निर्वाह का साधन भी है. दीया भले मिट्टी का हो मगर वह हमारे जीने का आदर्श है, हमारे जीवन की दिशा है और लक्ष्य तक पहुँचने का माध्यम है. दीपावली मनाने की सार्थकता तभी है, जब भीतर का अंधकार दूर हो. अंधकार जीवन की समस्या है और प्रकाश उसका समाधान. जीवन जीने के लिए सहज प्रकाश चाहिए.
दीपावली का न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक, सांस्कृृतिक, भौतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व है. यह पर्व हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की गौरव गाथा है. प्रत्येक भारतीय की रग-रग में यह पर्व रच-बस गया है. जो महापुरुष उस भीतरी ज्योति तक पहुँच गए, वे स्वयं ज्योतिर्मय बन गए. जो अपने भीतरी आलोक से आलोकित हो गए, वे सबके लिए आलोकमय बन गए. जिन्होंने अपनी भीतरी शक्तियों के स्रोत को जगाया, वे अनंत शक्तियों के स्रोत बन गए और जिन्होंने अपने भीतर की दीवाली को मनाया, लोगों ने उनके उपलक्ष्य में दीवाली का पर्व मनाना प्रारंभ कर दिया.
यह बात सच है, कि मनुष्य का रूझान हमेशा प्रकाश की ओर रहा है. अंधकार को उसने कभी न चाहा न कभी माँगा. ‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’ भक्त की अंतर भावना अथवा प्रार्थना का यह स्वर भी इसका पुष्ट प्रमाण है. अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल इस प्रशस्त कामना की पूर्णता हेतु मनुष्य ने खोज शुरू की. अंधकार हमारे अज्ञान का, दुराचरण का, दुष्टप्रवृत्तियों का, आलस्य और प्रमाद का, बैर और विनाश का, क्रोध और कुंठा का, राग और द्वेष का, हिंसा और कदाग्रह का अर्थात अंधकार हमारी राक्षसी मनोवृत्ति का प्रतीक है. जब मनुष्य के भीतर असद् प्रवृत्ति का जन्म होता है, तब चारों ओर वातावरण में कालिमा व्याप्त हो जाती है. अंधकार ही अंधकार नजर आने लगता है. मनुष्य हाहाकार करने लगता है. मानवता चीत्कार उठती है. ऐसे समय में मनुष्य को सन्मार्ग दिखा सके, ऐसा प्रकाश स्तंभ चाहिए. इन स्थितियों में हर मानव का यही स्वर होता है कि-प्रभो, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो. इस प्रकार हम प्रकाश के प्रति, सदाचार के प्रति, अमरत्व के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए आदर्श जीवन जीने का संकल्प करते हैं.
दीपावली का पर्व ज्योति का पर्व है. दीपावली का पर्व पुरुषार्थ का पर्व है. यह आत्मसाक्षात्कार का पर्व है. यह अपने भीतर सुषुप्त चेतना को जगाने का अनुपम पर्व है. यह हमारे आभामंडल को विशुद्ध और पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति जागरूकता का संदेश देने का पर्व है.
यद्यपि लोक मानस में दीपावली एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में अपनी व्यापकता सिद्ध कर चुका है. फिर भी यह तो मानना ही होगा कि जिन ऐतिहासिक महापुरुषों के घटना प्रसंगों से इस पर्व की महत्ता जुड़ी है, वे अध्यात्म जगत के शिखर पुरुष थे. इस दृष्टि से दीपावली पर्व लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का अनूठा पर्व है.
हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है. वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है. ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है. जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं. अंधकार का साम्राज्य स्वत: समाप्त हो जाता है. ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूर्च्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है.
दीपावली पर्व की सार्थकता के लिए जरूरी है, दीये बाहर के ही नहीं, दीये भीतर के भी जलने चाहिएं. क्योंकि दीया कहीं भी जले उजाला देता है. दीये का संदेश है कि हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुजदिली का धब्बा लगता है, जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएँ जीवन की सार्थक दिशाएँ खोज लेती हैं. असल में दीया उन लोगों के लिए भी चुनौती है जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, दिशाहीन और चरित्रहीन बनकर सफलता की ऊँचाइयों के सपने देखते हैं. जबकि दीया दुर्बलताओं को मिटाकर नई जीवनशैली की शुरूआत का संकल्प है.
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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