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अब एक नयी सम्पूर्ण क्रांति हो…

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आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है. और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है. ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले पे्ररणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण. जो अपने त्यागमय जीवन के कारण मृत्यु से पहले ही प्रात: स्मरणीय बन गये थे. अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया. लोकनायक जयप्रकाश की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही. उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े. जैसे भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन. वे विदेशी सत्ता से देशी सत्ता, देशी सत्ता से व्यवस्था, व्यवस्था से व्यक्ति में परिवर्तन और व्यक्ति में परिवर्तन से नैतिकता के पक्षधर थे. वे समूचे भारत में ग्राम स्वराज्य का सपना देखते थे और उसे आकार देने के लिए अथक प्रयत्न भी किए. उनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं के समाधानों के लिए प्रकट हुआ, एक अवतार की तरह, एक मसीहा की तरह.
लोकनायक जयप्रकाश की जीवन की विशेषताएं और उनके व्यक्तित्व के आदर्श कुछ विलक्षण और अद्भुत हैं, जिनके कारण से वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं. उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी. वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हों, किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे. वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे. यही कारण है, कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे.
महात्मा गांधी जयप्रकाश की साहस और देशभक्ति के प्रशंसक थे. उनका हजारीबाग जेल से भागना काफी चर्चित रहा और इसके कारण से वे असंख्य युवकों के सम्राट बन चुके थे. वे अत्यंत भावुक थे, लेकिन महान क्रांतिकारी भी थे. वे संयम, अनुशासन और मर्यादा के पक्षधर थे, इसलिए कभी भी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया. विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा और आर्थिक तंगी ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा. यह उनके किसी भी कार्य की प्रतिबद्धता को ही निरूपित करता था, उनके दृढ़ विश्वास को परिलक्षित करता है.
मैंने जेपी को नहीं देखा लेकिन उनकी प्रेरणाएं मेरे पारिवारिक परिवेश की आधारभित्ति रही है. मेरी माताजी स्व. सत्यभामा गर्ग उनकी अनन्य सेविका थी. राजस्थान में होने वाले जेपी के कार्यक्रमों को वे संचालित किया करती थीं, उनके व्यक्तिगत व्यवस्था में जुड़े होने के कारण उनके आदर्श एवं प्रेरणाएं हमारे परिवार का हिस्सा थे. मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी के जीवन से जुड़े एक बड़े विरोधपूर्ण वातावरण के समाधान में भी जयप्रकाश का अमूल्य योगदान है. उनकी चर्चित पुस्तक अग्निपरीक्षा को लेकर जब देश भर में दंगें भड़के, तो जेपी के आह्वान से ही शांत हुए. जेपी के कहने पर आचार्य तुलसी ने अपनी यह पुस्तक भी वापस ले ली थी. देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है, जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी. सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान में उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं. वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है. इसलिये आज एक नयी सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है. यह क्रांति व्यक्ति सुधार से प्रारंभ होकर व्यवस्था सुधार पर केन्द्रित हो. कुर्सी पर कोई भी बैठे, लेकिन मूल्य प्रतिष्ठापित होने जरूरी हैं. ऐसा करके ही हम एक महान लोकनायक को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे.
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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