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राज्यसभा की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?

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Indian Parliament.
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर विवाद होना और सवाल उठना स्वाभाविक है. इस मसले ने एक बार फिर राज्यसभा की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं. भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत जिस तरह की शर्मनाक घटनाएं घट रही हैं, इसमें आम आदमी पार्टी के द्वारा राज्यसभा सदस्य बनाने की स्थितियों ने एक दाग और जड़ दिया है.
Lalit Garg
इस तरह की शर्मनाक स्थितियों की वजह से लोगों की आस्था संसदीय लोकतंत्र के प्रति कमजोर होना स्वाभाविक है. मूल्यहीनता की चरम सीमा पर पहुंचकर राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग विचारधारा एवं नाम का वर्गीकरण रखते हुए भी राष्ट्रीय हित की उपेक्षा करने के मामले में एक जैसी हैं. कोई पार्टी राज्यसभा या किसी सदन के लिए किसे अपना प्रत्याशी बनाती है, यह उसका आंतरिक मामला हो सकता है. आमतौर पर सभी दल यही दलील पेश करते रहे हैं. लेकिन ‘आप’ की ओर से जो दो नए नाम सामने आए हैं, उनके चुनाव पर न केवल दूसरे दलों को पार्टी पर अंगुली उठाने का मौका मिला है, बल्कि शुरूआती दिनों से पार्टी के साथ रहे और अब किसी न किसी वजह से बाहर हो गए कई लोगों ने भी आश्चर्य व्यक्त किया है. माना जा रहा था, कि पार्टी नेता आशुतोष के अलावा, मतभेद की तमाम खबरों के बावजूद, कुमार विश्वास को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया जा सकता है. लेकिन तमाम संभावनाओं को दरकिनार कर संजय सिंह के अलावा सुशील गुप्ता और नारायण दास गुप्ता को चुना जाना अनेक सवालों को खड़ा कर रहा है. सुनने में आ रहा है, कि ‘आप’ के जिन तीन नामों को चुना गया है, उससे पहले ‘आप’ की ओर से रघुरामन राजन, शरद यादव और कैलाश सत्यार्थी के अलावा मीडिया और न्यायपालिका जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से कई बड़ी हस्तियों से राज्यसभा जाने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन उनमें से कोई तैयार नहीं हुआ. अगर इसमें सच्चाई है तो आम आदमी पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर किन वजहों से लोगों का भरोसा उससे डिग रहा है? क्यों ‘आप’ के प्रस्ताव को इन लोगों ने ठुकरा दिया? क्या ‘आप’ की विश्वसनीयता इतनी कमजोर हो गयी है? यह भी पढ़ें : 21वीं सदी की असुरक्षित महिलाएं सबसे बड़ी चिंता  भारत में जब अंग्रेजी हुकूमत थी तो उस समय अंग्रेजों ने ही लोकसभा और राज्यसभा को कायम किया था. आज के परिवेश में हमारा देश आजाद है, लेकिन सारे अंग्रेजी हुकूमत के तौर-तरीके आज भी पालन हो रहे हंै, जो कहीं से भी ठीक नहीं हैं. देश की जनता जब सीधे चुनाव के द्वारा लोकसभा के सदस्यों को चुनती है और लोकसभा के सदस्य इस देश के कानून बनाने में सक्षम हैं तो राज्यसभा का क्या औचित्य है? जब लोकसभा में भारत की जनता 540 सदस्य चुनकर भेजती है तो फिर जनता की गाढ़ी कमाई पर राज्यसभा के इन 280 सदस्यों की क्या जरूरत है? देश को सही दिशा में ले जाने के लिए राज्यसभा की जरूरत पर सार्थक बहस होनी ही चाहिए.
राज्यसभा की सदस्यता के लिए हर तरह के हथकंडे का प्रयोग किया जा रहे हंै. देश की सेवा का दंभ भरने वाले कई राजनेताओं के लिये अब देशसेवा या मानवसेवा का मार्ग नहीं रह गया है. अपनी प्रतिभा से राष्ट्र को मजबूती देने की स्थितियां भी अब नदारद हैं. आज देश में अनेक कानून मात्र राज्यसभा के कारण नहीं बन रहे हंै, जिससे दिन प्रतिदिन विधि व्यवस्था में गिरावट आ रही है. राज्यसभा विकास की बजाय अवरोध का जरिया बनती जा रही है. तलाक का कानून लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में अटक गया है. गलत राजनीति ही हमारे देश को पीछे ले जा रही है, जिसमें सुधार करना बहुत ही जरूरी है. लेकिन सभी अपनी-अपनी राजनीतिक रोटी सेकने में मशगूल हैं. कोई राजनीतिक दल राज्यसभा की अप्रासंगिकता के विषय पर गंभीर नहीं दिखता.
ऐसा लगता है कि वक्त गुजरने के साथ-साथ ‘आप’ और उसके नेताओं को अपनी साख की कोई फिक्र नहीं रह गई है. यह पार्टी भी भारतीय राजनीति की उन्हीं बीमारियों से ग्रसित होती जा रही है, जिन्हें दूर करने का उसने दावा किया था. आखिर किन वजहों से लोगों का भरोसा उस पर से डिग रहा है. आवश्यक है लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ खिलवाड़ बंद किया जाए ताकि उसकी गरिमा की रक्षा सुनिश्चित हो सके. राज्यसभा क्यों, प्रश्न पर भी मंथन जरूरी है?
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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