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न्याय की धीमी गति पर खड़े हुए सवाल

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सांकेतिक चित्र
देश में कानून प्रक्रिया की धीमी एवं सुस्त गति एक ऐसी त्रासदी बनती जा रही है, जिसमें न्यायालयों में न्याय के बजाय तारीखों का मिलना, केवल पीड़ित व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि समूची व्यवस्था को घायल कर देता है. इससे देश के हर नागरिक के मौलिक अधिकारों का न केवल हनन होता है, बल्कि एक बदनुमा दाग न्याय प्रक्रिया पर लग जाता है. इन दिनों जिस तरह के राजनीतिक अपराधों के न्यायालयी निर्णय सामने आये हैं, उन्होंने तो न्याय प्रणाली पर अनेक प्रश्न ही जड़ दिये हैं. बात चाहे चारे घोटाले की हो या 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की. देश की जनता का कानून व्यवस्था पर भरोसा उठने लगा है. आज न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बंधे होने अर्थ है, कि वह सब-कुछ देखकर अनदेखा कर रही है. सशक्त लोकतंत्र के लिये राजनीति को अपराध मुक्त करना जरूरी है तो न्याय प्रणाली को भी विलम्ब मुक्त करना होगा.
lalit garg
2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले पर आये निर्णय ने तो चौंकाया ही है, साथ ही साथ चारा घोटाले के एक और मामले में लालू यादव और कुछ अन्य लोगों को दोषी करार दिया गया. कोई नहीं जानता कि वह दिन कब आएगा जब चारे घोटाले के सारे मामलों में भी फैसला आएगा और इन सब मामलों का अंतिम तौर पर निस्तारण होगा? यह संतोष का विषय है, कि देर से ही सही, नेताओं के भ्रष्टाचार से जुड़े मामले अदालतों द्वारा निपटाए जा रहे हैं, या फिर इस पर हैरानी प्रकट की जाए कि न्याय की गति इतनी धीमी क्यों है?  यह भी पढ़ें : अंतस की जागृति का संदेश देता है दीपावली का पर्व… 
न्याय की धीमी गति ऐसा प्रश्न है जो न केवल न्याय प्रणाली पर बल्कि हमारे समूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर एक ऐसा दाग है, जिसने सारे दागों को ढक दिया है. एक तरह से अपराध पर नियंत्रण की बजाय अपराध को प्रोत्साहन देने का जरिया बनती जा रही है हमारी कानून व्यवस्था. न्याय के विलम्ब से अपराध करने वालों के हौंसले बुलन्द रहते हैं, कि न्याय प्रक्रिया उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती या बीस-पच्चीस वर्षों में फैसला आयेगा, जब तक स्थितियां बहुत बदल चुकी होंगी, अपराध करने वाले जिन्दा रहेंगे भी या नहीं. अदालती फैसलों की विडम्बना ही कही जायेगी कि जब अनेक निर्णय आते हैं तब तक तो अपराधी स्वर्ग पहुंच चुके होते हैं. यह सही है, कि चारा घोटाला सरकारी धन की लूट का एक बड़ा मामला था और उसमें नेताओं और नौकरशाहों के साथ चारा आपूर्ति करने वाले भी तमाम लोग शामिल थे, लेकिन आखिर इसके क्या मायने कि जो घोटाला 1996 में उजागर हुआ, उसमें फैसला 2017 में हो रहा है? राम-रहीम से पीड़ित साध्वी का उदाहरण भी हमारे सामने है. उन्होंने अपनी पहचान छिपाते हुए देश के सर्वोच्च व्यक्ति माननीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा बयान की थी. फिर भी न्याय मिलने में 15 साल और भाई का जीवन लग गया. यह वह देश है जहाँ बलात्कार की पीड़ित एक अबोध बच्ची को कानूनी दाँव-पेंचों का शिकार होकर 10 वर्ष की आयु में एक बालिका को जन्म देना पड़ा था. जहाँ साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को सुबूतों के अभाव के बावजूद वर्षों जेल में रहना पड़ा है. यह देर ही नहीं, एक तरह की अंधेर है. इसी अंधेरगर्दी एवं अदालती कामकाज पर शोध करने वाली बंगलुरु की एक संस्था के अध्ययन में यह बात सामने आई है, कि देश के कुछ हाईकोर्ट ऐसे हैं जो मुकदमों का फैसला करने में औसतन चार साल तक लगा दे रहे हैं. वहीं निचली अदालतों का हाल इससे भी दोगुना बुरा है. वहां मुकदमों का निपटारा होने में औसतन छह से साढ़े नौ साल तक लग रहे हैं. हाईकोर्ट के मामले में देश भर में सबसे बुरा प्रदर्शन राजस्थान, इलाहाबाद, कर्नाटक और कलकत्ता हाईकोर्ट का रहा है. निचली अदालतों में गुजरात सबसे फिसड्डी है, जिसके बाद उड़ीसा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र आदि आते हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा न्यायिक प्रणाली बेहद धीमी गति से काम कर रही है. नतीजतन अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या करोड़ों तक पहुंच चुकी है. राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है. अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले तीस वर्षों में देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या करीब पंद्रह करोड़ तक पहुंच जाएगी. इस मामले में विधि एवं न्याय मंत्रालय के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं. रिपोर्ट के अनुसार देश में 2015 तक देश के विभिन्न अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित थे.
एक कहावत है, कि दुश्मन को भी अस्पताल और कचहरी का मुंह न देखना पड़े. इसके पीछे तर्क यही है कि ये दोनों जगहें आदमी को तबाह कर देती हैं और जीतनेवाला भी इतने विलंब से न्याय पाता है, कि वह अन्याय के बराबर ही होता है. यह सब केवल इसलिए होता है, कि मुकदमों की सुनवाई और फैसले की गति बहुत धीमी है. वर्षों तक मुकदमे फैसले के इंतजार में पीड़ितों का न सिर्फ समय और पैसा बर्बाद होता है, बल्कि सबूत भी धुंधले पड़ जाते हैं. देश में आबादी के लिहाज से जजों की संख्या बहुत कम है, विकसित देशों की तुलना में कई गुना कम. बात केवल अदालतों से न्याय नहीं मिल पाने तक सीमित नहीं है, बात न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले समय की भी है और न्याय संस्कृति को दुरुस्त करने की भी है.
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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