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शौक की सेल्फी का जानलेवा होना

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सांकेतिक चित्र
विश्व की उभरती हुई गंभीर समस्याओं में प्रमुख है मोबाइल कैमरे के जरिए सेल्फी लेना. इन दिनों मोबाइल कैमरे के जरिए सेल्फी यानी अपनी तस्वीर खुद उतारने के शौक के जानलेवा साबित होने की खबरें आए दिन सुनने को मिल रही हैं. नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह कैद हो गयी है. आज युवा कोई रोमांचक, हैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहे हैं. इसी मंगलवार को ओड़िशा के रायगढ़ जिले में सेल्फी लेने के क्रम में एक महिला और उसके बेटे की दर्दनाक मौत हो गई. लेकिन हैरानी की बात यह है, कि लोग ऐसी घटनाओं से कोई सबक नहीं ले रहे और सरकारें भी मूकदर्शक बन इन हादसों को देख रही हैं.
किसी हादसे में हुई मौतों में हालात के कई पहलू होते हैं. लेकिन सेल्फी की वजह से हुई मौतें इसलिए ज्यादा दुखद हैं, कि ये महज शौक के चलते बरती गई लापरवाही का नतीजा होती हैं. इस दीवानगी को ओढ़ने के लिये प्रचार माध्यमों ने तो गुमराह किया ही है, लेकिन सोशल साइट्स भी भटका रही हैं.
Lalit Garg
सेल्फी का चलन किशोरों व युवाओं के सिर चढ़कर बोल रहा है. खतरनाक एवं रोमांचक सेल्फी लेने की होड़ मची है. हर कोई क्रेजी हो रहा है. रोमांचक सेल्फी के लिए जब जान का जोखिम उठाया जाता है, तो यह जुनून अक्सर जानलेवा साबित होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी तस्वीरें लेने का सबसे बेहतरीन और आसान तरीका सेल्फी ही है. यह सुनहरा पहलू है, लेकिन दूसरा चिंताजनक पहलू यह है, कि भारत में सेल्फी से होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है. स्थिति उनके लिए और भी खतरनाक है जो सेल्फी के लिए सारी हदों को लांघ जाते हैं. वे भूल जाते हैं, कि जिंदगी की अहमियत एक सेल्फी से कहीं ज्यादा होती है. कई घटनाओं में पाया गया कि जिन लोगों में सेल्फी का भूत सवार हैं, वे मानसिक रूप से अस्वस्थ थे. खतरनाक सेल्फी लेने की होड़ में कब, किसकी सेल्फी आखिरी साबित हो जाए इस को कोई नहीं जानता? इसके खतरनाक रूप सामने आने के बाद युवाओं को खतरों से बचाने के लिए अब कानून का सहारा लेना पड़ रहा है. समुद्र के आसपास, नदी के किनारे, ऊंचे पुलों, पहाड़ों एवं रेलवे के पटरियों के आसपास ऐसी चेतावनियां दी जाती हैं, कि यहां सेल्फी लेना मना है. रेलवे ने पटरियों को ‘नो सेल्फी जोन’ घोषित कर दिया है. ऐसा करने वालों को जेल की हवा खाने के साथ जुर्माना भी भरना पड़ सकता है. एक साल पहले सेल्फी के चक्कर में मथुरा में 3 युवकों याकूब, इकबाल व अफजल को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, तीनों जानलेवा जोखिम उठाकर चलती ट्रेन के सामने सेल्फी लेने लगे. चालक के हॉर्न देने पर भी वे नहीं हटे और ट्रेन की चपेट में आ गए. सवाल यह है, कि सेल्फी का नशा क्यों इतना सर चढ़कर बोल रहा है? रोजाना की एक रस जिंदगी में मनोरंजन या नयेपन को मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी माना जाता है. लेकिन अगर इस तरह की गतिविधियां जानलेवा शौक में तब्दील हो जाएं तो उस शौक से तौबा कर लेना ही ठीक है. हाल में हुए कई अध्ययनों में सेल्फी लेने की आदत को एक मानसिक बीमारी बताया गया है, जिसका शिकार व्यक्ति इस बात का ख्याल भी नहीं रख पाता कि खतरनाक जगहों पर अलग-अलग मुद्राओं में अपनी तस्वीरें उतारने के क्रम में उसकी जान भी जा सकती है. मनोचिकित्सकों के मुताबिक ‘सेल्फीसाइटिस’ एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करता है तो उसे बेचैनी होने लगती है. इसका अगला सिरा इससे जुड़ता है कि इस आदत के शिकार लोग सार्वजनिक रूप से तो सामाजिक दिखते हैं, खूब तस्वीरें साझा करते हैं, लेकिन उनके भीतर आत्मविश्वास का कोना धीरे-धीरे खाली होता जाता है. यह भी पढ़ें : राज्यसभा की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?  करीब सवा साल पहले सेल्फी से हो रही मौतों पर किये गये एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में सेल्फी लेने के क्रम में हुई मौतों में से साठ फीसद अकेले भारत में हुई थीं. विडंबना यह है, कि जो आदत इस कदर एक समस्या बन चुकी है, उसका कोई हल तो सामने नहीं आ रहा है, लेकिन बाजार इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. आज स्मार्टफोन में तब्दील हो चुके ज्यादातर मोबाइलों की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियां विज्ञापन में सेल्फी के लिहाज से बेहतरीन कैमरा होने को अपने उत्पाद की सबसे बड़ी खासियत बताती हैं. जाने-माने सितारे ऐसे मोबाइलों का प्रचार करते हुए उनके सेल्फी वाले पहलू को ज्यादा उभारते हैं. मुश्किल यह है कि सेल्फी मोबाइलों के विज्ञापन के समांतर किसी ऐसी सूचना का प्रसार नहीं दिखता, जो लोगों को इस शौक के जानलेवा जोखिम के बारे में सचेत करे. आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने सेल्फी को वर्ल्ड आॅफ द ईयर तक चुना. लेकिन सेल्फी की वजह से होने वाली मौतें झकझोर कर देने वाली हैं. हादसों से युवाओं को सबक लेना चाहिए कि देखा-देखी वे क्रेजी न बनें. ऐसी रोमांचक एवं विस्मयकारी सेल्फी से दूर ही रहें, जिससे जान का खतरा हो. अभिभावकों को भी अपने बच्चों को जागरूक करना चाहिए. जब जिंदगी ही नहीं होगी तो सेल्फी कहां से आएगी? पक्षी भी एक विशेष मौसम में अपने घोसलें बदल लेते हैं, पर मनुष्य अपनी वृत्तियां, आदतें नहीं बदलता. वह अपनी वृत्तियां, शौक एवं आदतों को तब बदलने को मजबूर होता है, जब दुर्घटनाओं, दुर्दिनों, दुर्भाग्य एवं मौत से उसका सामना होता है. जानलेवा होते सेल्फी के प्रचलन पर नियंत्रण के लिये पक्षियों के इस सन्देश को समझने एवं समय रहते जागने की जरूरत है.
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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