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होली कोरा पर्व ही नहीं, संस्कृति भी

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भारत जैसे धर्मप्रधान और तीज-त्यौहारों वाले देश में होली अनूठा एवं अलौकिक त्यौहार है. यह लोक पर्व है, मनुष्यता का पर्व है, समाज का पर्व है, संस्कृति का पर्व है एवं यह बंधनमुक्ति का पर्व है. इसमें आप समाज को सर्वोपरि मनाने की घोषणा करते हैं. यह विशुद्ध मौज-मस्ती व मनोरंजन का सांस्कृतिक त्यौहार है.
होली अन्य सभी त्यौहारों से थोड़ा हटकर है. इसका संदेश मौज-मस्ती से परिपूर्ण है. मानव समुदाय अपने समस्त दु:खों, उलझनों एवं संतापों को भुलाकर ही इस त्यौहार को उसकी संपूर्णता के साथ मनाते हैं. फाल्गुन की पूर्णिमा ही नहीं अपितु पूरा फाल्गुन मास होली के रंगों से सराबोर हो जाता है. होली का त्यौहार ज्यों-ज्यों निकट आता जाता है, त्यों-त्यों हम नए उत्साह से ओत-प्रोत होने लगते हैं.
होली पर्व का विशेष धार्मिक, पौराणिक व सामाजिक महत्व है. इस त्यौहार को मनाने के पीछे एक पौराणिक पात्र राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र भक्त प्रह्लाद और उनकी बहन होलिका की कथा प्रसिद्ध है. इसके अलावा एक कथा यह भी प्रचलित है, कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दमन कर गोपबालाओं के साथ रास रचाया, तब से होली का प्रचलन शुरू हुआ. यह पर्व विभिन्न संस्कृतियों को एकीकृत कर आपसी एकता, सद्भाव तथा भाईचारे का परिचय देता है. होली का पावन पर्व यह संदेश लाता है, कि मनुष्य अपने ईर्ष्या, द्वेष, नफरत तथा परस्पर वैमनस्य को भुलाकर समानता व प्रेम का दृष्टिकोण अपनाएँ.
Lalit Garg
होली का आगमन इस बात का सूचक है, कि अब चारों तरफ वसंत ऋतु का सुवास फैलनेवाला है. राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है. फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं. होली का त्यौहार बसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है. उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है. इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है. खेतों में सरसों खिल उठती है. बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं. जिंदगी जब सारी खुशियों को स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना माँगती है, तब प्रकृति मनुष्य को होली जैसा त्यौहार देती है. यही कारण है, कि होली के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता. यह त्यौहार आपसे दो टूक सवाल करता है.आपको आनन्द बटोरना है या उदासीन होकर कमरे में बन्द रहना है. यह ऊपर से ओढ़ी हुई गंभीरता को चीरकर फेंक देता है और आपको आपके असली रूप में उजागर करता है. इसीलिए इसे व्यक्ति के विवेचन का पर्व कहा जाता है. हमारी दमित इच्छाएं और कुंठाएं विमुक्त हो जाती हैं. इस दिन हम देख पाते हैं, कि किस तरह समाज ने हमारी कुरूपता देखकर भी हमें खारिज नहीं किया. यह बोध व्यक्ति के विरेचन से कहीं आगे ले जाता है. यह भी पढ़ें : सीलिंग और सियासत 
होली हमारे देश का एक विशिष्ट सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक त्यौहार है. अध्यात्म का अर्थ है मनुष्य का ईश्वर से संबंधित होना है या स्वयं का स्वयं के साथ संबंधित होना. इसलिए होली मानव का परमात्मा से एवं स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का पर्व है. असल में होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है, इसी से जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है, औरों के दुख-दर्द को बाँटा जाता है, बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है. लेकिन आनंद और उल्लास के इस सबसे मुखर त्यौहार को हमने कहाँ-से-कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है. कभी होली के चंग की हुंकार से जहाँ मन के रंजिश की गाँठें खुलती थीं, दूरियाँ सिमटती थीं, वहाँ आज होली के हुड़दंग, अश्लील हरकतों और गंदे तथा हानिकारक पदार्थों के प्रयोग से भयाक्रांत डरे सहमे लोगों के मनों में होली का वास्तविक अर्थ गुम हो रहा है. यद्यपि आज के समय की तथाकथित भौतिकवादी सोच एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव, स्वार्थ एवं संकीर्णता भरे वातावरण से होली की परम्परा में बदलाव आया है. परिस्थितियों के थपेड़ों ने होली की खुशी और मस्ती को प्रभावित भी किया है, लेकिन आज भी बृजभूमि ने होली की प्राचीन परम्पराओं को संजोये रखा है. यह परम्परा इतनी जीवन्त है, कि इसके आकर्षण में देश-विदेश के लाखों पर्यटक ब्रज वृन्दावन की दिव्य होली के दर्शन करने और उसके रंगों में भीगने का आनन्द लेने प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं. होली को सम्पूर्णता से आयोजित करने के लिये मन ही नहीं, माहौल भी चाहिए और यही होली पर्व की उन्मुक्तता में देखने को मिलता है.
होली में भारत का सांस्कृतिक मानस छुपा है. उस मानस में क्या है? इसे आप हुल्लड़ और रंगपाशी के रिवाजों में समझिए. आप सजे-संवरे बैठे हैं. दोस्तों और रिश्तेदारों का हुजूम आता है और आपको बदशक्ल बना देता है. आपके काले बालों में लाल गुलाल, गोरे चेहरे पर हरा रंग, सफेद कुर्ते पर कीचड़-मिट्टी पोत देता है.और आप हंसते हैं, नाराज नहीं होते. यही ऐसा त्योहार है जो आपको किसी के अशालीन और असभ्य होने पर भी आपको गुस्सा नहीं दिलाता, बल्कि इन स्थितियों में भी आनन्द देता है. ऐसा होना जीवन की अनिवार्यता है. क्योंकि मनुष्य का जीवन अनेक कष्टों और विपदाओं से भरा हुआ है. वह दिन-रात अपने जीवन की पीड़ा का समाधान ढूंढने में जुटा रहता है. इसी आशा और निराशा के क्षणों में उसका मन व्याकुल बना रहता है. ऐसे ही क्षणों में होली जैसे पर्व उसके जीवन में आशा का संचार करते हैं. जर्मनी, रोम आदि देशों में भी इस तरह के मिलते-जुलते पर्व मनाए जाते हैं. गोवा में मनाया जाने वाला ‘कार्निवाल’ भी इसी तरह का पर्व है, जो रंगों और जीवन के बहुरूपीयपन के माध्यम से मनुष्य के जीवन के कम से कम एक दिन को आनंद से भर देता है.
आज की तनाव भर जिंदगी में तो होली जादू की झप्पी की तरह है, इसलिए आज तो होली पहले से कहीं ज्यादा प्रिय होनी चाहिए. क्योंकि आज हर कोई व्यस्त है, हर कोई कहीं पहुंचने, कहीं जाने की जल्दी में है. सबके लक्ष्य अधूरे हैं, क्योंकि हर कोई बहुत महत्वाकांक्षी है. जाहिर है ऐसी जीवनशैली तनाव और तनाव ही देगी. तनाव की इस जिंदगी में जरूरी है हम होली जैसे त्यौहारों को वरदान समझें और टीवी, इंटरनेट और मोबाइल से उलझकर रह गई अपनी जिंदगी को थोड़े उल्लास और उमंगों से सराबोर करें. वास्तव में होली आज की जीवनशैली में वैसी ही है, जैसे तपते रेगिस्तान में ठंडी, शीतल बयार. होली दिल से गुबार निकालने का भी एक जरिया है. लोग वैयक्तिक रूप से विपश्यना और विरेचन से गुजरते हैं ताकि तनावमुक्त हो सकें. होली तो पूरे समाज का सामूहिक विरेचन है.
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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