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महिलाओं का सम्मान करना सीखें

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सांकेतिक चित्र
महिलाएं एक देवतारूपी, दादी, माँ, बहन, पत्नी, दोस्त जैसे कई रूपों में अपनी भूमिका निभाते हुए इस जीवनचक्र को चलाती हैं. जैसे हमें जब भी आवश्यकता होती है तो हम महिलारूपी देवियों के चरणों मे आ बैठते हैं. हमें शक्ति चाहिए तो हम माँ शेरावाली का ध्यान करते हैं, जब ज्ञान चाहिए तो माँ सरस्वती और धन की आवश्यकता होती है तो माँ लक्ष्मी को याद करते हैं.
praveen kaviya
हम इस जीवनचक्र में सैंकड़ों वर्षों से महिलाओं का स्नेह, ममता, संघर्ष, शक्ति तथा और भी बहुत से बदलाव देखते आये हैं. महिलाओं के विकास, सम्मान, उत्थान व बराबरी के लिए समाज में समयानुसार बहुत से बदलाव आए. सतीप्रथा पर रोक, पर्दा प्रथा रोकथाम, महिला कल्याण, समानता का अधिकार, महिला उत्थान रक्षा हेतु कानून और अब महिला सशक्तिकरण के रूप में समय-समय पर महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने हेतु परिवर्तन होते रहे हैं.
हमारे समाज में महिला अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक एक अहम किरदार निभाती है. अपनी सभी भूमिकाओं में निपुणता से आगे बढ़ते हुए इस आधुनिक युग में महिला पुरूष समाज के साथ खड़ी दिखाई देती है. महिलाओं को अपनी जिंदगी का ख्याल तो रखना ही पड़ता है, साथ में पूरे परिवार का ध्यान भी रखना पड़ता है. वह पूरी जिंदगी बेटी, बहन, पत्नी, माँ, सास, और दादी जैसे रिश्तों को ईमानदारी से निभाती है. सभी रिश्तों को निभाते हुए पूरी शिद्दत से नौकरी भी करती है, ताकि अपना, परिवार का, और देश का भविष्य उज्जवल बना सके. बच्चों की सबसे बड़ी दोस्त व गुरु महिला के रूप में सर्वप्रथम माँ ही होती है. माँ सुबह उठकर खाना बनाती है. बच्चों को तैयार करती है. बच्चों,पति व घर के सदस्यों को खाना खिलाती है, फिर आॅफिस जाती है. वहाँ से आकर फिर घर के कार्यों में लग जाती है. हमारे जीवन में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है. चाहे वह किसी भी रूप में हो. मौजूदा समय में समाज में महिलाओ की योग्यता को पुरुषों से कमतर नहीं देखा जाता है. हमें यह पता होना चाहिए कि महिलाओं की वजह से परिवार बनता है. परिवार से घर बनता है, घर से समाज बनता है और समाज से ही देश बनता है. यह भी पढ़ें : बलात्कार अपराध या मानसिकता..?  इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है, कि महिलाओं का योगदान हर क्षेत्र में है. महिलाओं की क्षमता को नजरंदाज करके समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. देश की आबादी में लगभग आधी आबादी महिलाओं की है. महिलाएं जैसे-जैसे शिक्षित व जागरूक होती जा रही हैं, उनकी राजनीतिक,आर्थिक तथा सामाजिक विकास में भागीदारी बढ़ रही है. और इसके चलते राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका प्रबल हो रही है. आज माहौल बदलता जा रहा है. महिलाएं जागरूक हो गई हैं और सभी क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं. मेरा मानना है, कि शिक्षा, जागरूकता और महिला सशक्तिकरण के बिना परिवार, समाज और देश का विकास नहीं हो सकता. सरकारों द्वारा महिला विकास व उत्थान हेतु समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए. हमें भी महिलाओं के विकास व सशक्तिकरण हेतु महिलाओ, महिला संगठनों, संस्थाओं को बढ़ावा देना चाहिए. एक ऐसा माहौल बनाना होगा कि महिलाएं अपने आपको अकेला न समझें, बल्कि उन्हें विश्वास हो कि पुरूष समाज पिता, पुत्र, पति, भाई के रूप में सदैव उनके साथ है. जिस दिन हम दूसरों की माँ को अपनी माँ, बहन को अपनी बहन समझने लगेंगे, उस दिन सही मायने में महिलाओं का सम्मान होगा. महिलाओं के योगदान, समर्पण, त्याग, बलिदान व विकास की इस लंबी यात्रा को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं.
(प्रवीण कविया, लेखक एडवोकेट हैं)

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