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बलात्कार अपराध या मानसिकता..?

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सांकेतिक चित्र
प्राचीन युग से ही हमारे समाज में नारी का विशेष स्थान रहा है. हमारे पौराणिक ग्रंथों में नारी को पूजनीय एवं देवीतुल्य माना गया है. हमारी धारणा रही है, कि देव शक्तियां वहीं पर निवास करती हैं, जहां पर समस्त नारी जाति को प्रतिष्ठा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने बड़े ही संवेदनशील भावों से नारी को व्यक्त किया है. ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी.’
देश में बढ़ते यौन अपराधों पर अरसे से चिंता जताई जा रही है. लेकिन यह कड़वी हकीकत है, कि उनमें कमी आने की बजाय वृद्धि ही हो रही है. दुधमुँही बच्चियों से लेकर वृद्धाओं तक के हवस का शिकार बनने की खबरें आती रहती हैं. बलात्कार और अन्य यौन अपराधों में इजाफे के लिए लड़कियों एवं महिलाओं के कथित उत्तेजक पहनावे, चाल-ढाल, टीवी, फिल्मों या इंटरनेट पर पसरी अश्लीलता और सहज सुलभ यौन सामग्री को जिम्मेदार बताकर आखिर हम समाज की विकृत यौन मानसिकता से कब तक नजरें चुराते रहेंगे?
हर रोज सुबह जब अखबार के पन्ने पलटती हूँ, तो एक हफ्ते में कम से कम एक या दो दिन ऐसा होता ही है, जब अखबार अपने साथ ऐसी खबरें लाता है. जिसमें कहीं कोई छोटी सी बच्ची या जवान लड़की या कोई औरत किसी की हवस का शिकार बन जाती है. यह भी पढ़ें : धूमधाम से मना सर्वोदय बाल विद्यालय प्रह्लादपुर बांगर का ज्ञानदीप वार्षिकोत्सव 
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है राजधानी दिल्ली में हुआ निर्भया कांड और हाल ही में पाकिस्तान में मासूम से हुआ रेप केस. जिसने एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार कर दिया. लेकिन प्रशासन आज भी हाथ पर हाथ धरे बैठे सोचता रह जाता है और नेता बलात्कार जैसी सामाजिक बुराई पर भी वोटों की राजनीति करने से पीछे नहीं रहते.
समूचे देश को दहला देने वाले निर्भया कांड में पीड़ित के साथ सबसे ज्यादा बर्बर सलूक एक नाबालिग का ही पाया गया था. उसकी क्रूरता और अपराध की साजिश में सहभागिता शातिर अपराधियों को भी मात करने वाली थी.
लेकिन नाबालिग होने के चलते मिले कानूनी कवच के कारण उसे सुधार गृह में रखा गया और अट्ठारह साल की उम्र होने के बाद रिहा कर दिया गया. इस रिहाई से बहुत से सवाल भी उठे. उसके अपराध की गंभीरता को देखते हुए उस पर वयस्कों के लिए बने कानूनों के तहत मुकदमा चल सकेगा और दस साल तक की सजा हो सकती है, ऐसा कहा गया था. यह कानून बनने के बाद कहा गया था, कि अब नाबालिग अपराधियों में पैदा होने वाला खौफ उनके कदमों को अपराध की डगर पर जाने से रोकेगा. लेकिन अफसोस कि ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. इससे स्पष्ट है, कि अपराधों को कानूनी घेरा कसने या सजा का दायरा बढ़ाने भर से रोका या कम नहीं किया जा सकता.
पुलिस रिकार्ड के मुताबिक लगभग पचास फीसदी यौन अपराधों में सोलह से कम उम्र के किशोर शामिल पाए जाते हैं. राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकडों की गवाही लें, तो किशोरों के यौन अपराधों में ग्यारह फीसदी की रफ्तार निश्चित ही विस्फोट है, जिसे तुरंत रोका जाना जरुरी है. बचपन बचाओ, बेटी बचाओ, महिला कल्याण या स्त्री सशक्तिकरण के तमाम नारे भी अगर हमारे समाजिक परिवेश में बच्चियों एवं स्त्रियों के प्रति संवेदना नहीं जगा सके हैं, तो क्या हमें आत्ममंथन नहीं करना चाहिए?
आज जब हालात इतने खराब हैं, कि एक माँ, अपनी नौ महीने की बेटी को लेकर आॅटो में नहीं जा सकती. रात में बस में सफर नहीं कर सकती. घर हो या आॅफिस, हर जगह डर-डरकर जीना पड़ रहा है तो इसकी एक ही वजह है, और वो है हमारे समाज में फैली बीमारी, जिसका नाम ‘मानसिकता’ है.
अफसोस इस बात का है, कि जिस समाज में हम औरत को देवी कहकर पूजते हैं. हमारी बहन , बेटी की इज्जत की रक्षा करते हैं, उसी समाज में बाहर जाकर पराई बहन-बेटी को छेड़ते हैं.
दोष हम सबका ही है. क्योंकि हम से ही समाज है और हम ही समाज को ऐसा व्यवहार करने की सहमति देते हैं. हमें औरों का नहीं पता, लेकिन अगर नारी शक्ति आपस में एक हो जाए और इस मानसिकता से लड़ने के लिए तत्पर होकर अपने घर से ही अपने बेटों को नारी की इज्जत करना और अपनी बेटियों को आत्मरक्षा का पाठ पढाएं, तो बेशक एक सुंदर और स्वस्थ समाज की कल्पना की जा सकती है.
-प्रिया सिंह

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